संस्थान के बारे में

श्री राणी भटियाणी मन्दिर संस्थान, जसोल

श्री राणी भटियाणी मंदिर संस्थान, जसोल, श्री राणीसा भटियाणीसा मंदिर (जसोल धाम) में दैनिक गतिविधियों को नियंत्रित करने और प्रबंधित करने के लिए अधिकृत सार्वजनिक निकाय है। यह श्रद्धालुओं हेतु विभिन्न सुविधायें जैसे कि शुद्धजल, आवास, भोजन, पार्किंग व अन्य सुविधाएं प्रदान करता है। जसोल राजस्थान राज्य के बाड़मेर जिले की पचपदरा तहसील में, राष्ट्रीय राजमार्ग 112 पर प्राचीन लूनी नदी के किनारे एक बड़ा गाँव है। जसोल बालोतरा रेल्वे स्टेशन से पहुँचा जा सकता है।

यह एक धार्मिक स्थान है जहां सभी धर्मों को एक समान माना जाता है यहां विश्वास और धैर्य की शक्ति सबसे महत्वपूर्ण है। यहां प्रार्थना में सभी सिर झुकाते हैं, तथा विश्वास कायम होता है, और मिन्नतें फलीभूत होती हैं, व धैर्य की अनुभूति होती हैं और असीम आनंद व चिरस्थायी संतोष व्याप्त है। ऐसी जगह की महिमा दया की सच्ची देवी श्री राणीसा भटियाणीसा से संबंधित है, जो सभी भक्तों पर समद्रष्टि से कृपा बरसाती हैं।

श्री राणीसा भटियाणीसा के श्रद्धालुओं की श्रद्धा ने इस गाँव को एक पवित्र तीर्थस्थल बना दिया है। भारत और विदेशों से लाखों भक्त यहाँ लगातार आते हैं। श्री राणीसा भटियाणीसा जिनको श्रद्धालुओं द्वारा स्नेह से माजीसा व माँ जसोल के नाम से भी जाना जाता है। श्री राणीसा भटियाणीसा के चमत्कारिक परचो और उनमें विश्वास से सभी जातियों, पंथों और धर्मों के लोगों के लिए जसोल एक अद्वितीय पवित्र तीर्थ स्थान में परिणित हो गया है। जसोल धाम की यात्रा करते समय, सभी भक्तगण मन की आंतरिक शांति और इच्छापूर्ति का अनुभव करते हैं । सभी मौसम के दौरान, जसोल एक सुविधाजनक स्थान है। जसोल एक ऐसी जगह है जहां आज भी राणीसा के सभी भक्त आशा व विश्वास के साथ आते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर वापस असीम शांति के साथ माँ का आशीर्वाद लेकर लौटते हैं।

संक्षिप्त इतिहास

श्री राणीसा स्वरुप कंवर भटियाणीसा 18वीं शताब्दी में राजस्थान के बाड़मेर जिले के जसोल ग्राम में ‘‘लोक देवी‘‘ के रुप में प्रकट हुई तथा लगभग 300 वर्षो से पूजित है। भारत की स्वतंत्रता से पूर्व जसोल महेचा राठौडों के मालाणी क्षेत्र की राजधानी थी जिसका क्षेत्र बाड़मेर, जैसलमेर, जालोर व सिंध के कई भागों पर रहा । महेचा राठौड़ अपना उद्भव राष्ट्रकूटो से मानते है लेकिन बाद में कन्नौज के राव सिंहाजी से मानते है, जो कि 12वी शताब्दी में राजस्थान आये और पाली पर आधिपत्य स्थापित किया। उनके पुत्र राव आस्थानजी ने बाड़मेर जिले में लूनी नदी के तट पर खेड़ पर आक्रमण कर गुहिलो को हरा कर राठौड़ राज्य की नींव रखी।

14वीं शताब्दी में संत शासक रावल श्री मल्लीनाथजी के समय में राठौड़ वंश राज्य की राजधानी खेड़ से मेवानगर या महेवा हस्तांतरित हो गई। रावल श्री मल्लीनाथजी को 'माला' भी कहा जाता है और उन्हीं के नाम से उनके राज्य का नाम मालाणी पड़ा। तथा महेवा के राठौड़ो को कालान्तर में महेचा कहा गया। रावल श्री मल्लीनाथजी व उनकी राणी रुपादेजी दोनो उच्च कोटि के संत हुए व लोक देवता के रुप में पूजे गये। रामदेवजी, पाबूजी, हड़बूजी व जैसल और तोरल(कच्छ भुज) उन्ही के समकालीन थे और श्री राणीसा रुपादेजी के भजनों से ज्ञात होता है कि इन सभी संतो का समागम लूनी नदी के तट पर तिलवाड़ा में हुआ था। जिसकी स्मृति में पिछले 700 वर्षो से चैत्र माह में राजस्थान का सबसे प्राचीन मेला लगता है।

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इसी महेचा राठौड़ कुल में 18वी शताब्दी में रावल श्री कल्याणमलजी से श्री स्वरुप कॅंवर यानि श्री राणीसा भटियाणीसा का विवाह हुआ था। वे जैसलमेर के जोगीदास गाॅंव के ठाकुर श्री जोगीदासजी भाटी की सुपुत्री थी। उनका जन्म का नाम स्वरुप कॅंवर था। उनके जन्म के समय ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी कि कन्या भाग्यशाली होगी व दुनिया में नाम होगा। वे एक सुशील, सुसंस्कारमय, रुपवान व आध्यात्मिक प्रवृत्ति की कन्या थी। उनके विवाह के बाद वे बाड़मेर जिले के जसोल राजपरिवार में रहने लगी। शादी के कुछ वर्ष पश्चात उनको पुत्र रत्न प्राप्त हुआ जिसका नाम कुॅंवर लालसिंह रखा गया। रावल श्री कल्याणमलजी के एक और राणी देवड़ीजी सिरोही से थी। एक दिन जब राणीसा भटियाणीसा तीज के त्यौहार मनाने बाहर गई हुई थी और उनका नन्हा पुत्र कुॅंवर लाल बन्नासा अकेले सो रहे थे जब राणीसा भटियाणीसा वापस लौटी तो अपने लाडले पुत्र को मृत पाकर अति व्याकुल हो गई और पुत्र वियोग में अपने प्राण त्याग दिये।

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इस अप्रत्याशित दुखद घटनाक्रम से उनके पति श्री रावल कल्याणमलजी भी शोक मग्न हो गये। भारी मन से अपनी सात्विक पत्नि का दाह संस्कार किया और उसी स्थान पर चमत्कारी ढंग से एक खेजड़ी का पौधा उग गया जो वृक्ष बनकर आज तक श्रद्धालुओं के विश्वास का केन्द्र बना हुआ है। कालान्तर में श्री राणीसा भटियाणीसा ने अनेक लोगों को चमत्कार दिखाये और उक्त श्मशान भूमि में एक छोटा देवल (छत्री) श्रद्धालुओं द्वारा बना दिया गया,  उसी समय जोगीदास गांव से कुछ दमामी राणीसा भटियाणीसा को मिलने जसोल आये और महल में जाकर गीत गाने लगे(उनके स्वर्गलोक गमन का उन्हे पता नही था) तब राणीसा भटियाणीसा (देवलोक होने के बाद) उनके सामने प्रकट होकर उन्हें आभूषण व बेशकीमती पौशाकें दी।जब उन्होने गांव के लोगो को बताया और हकीकत का पता पड़ा तो उक्त चमत्कार से सभी स्तब्ध रह गये, और इस प्रकार के अनेक चमत्कारों के बाद श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई |

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श्री राणी भटियाणी मन्दिर संस्थान के अध्यक्ष श्री रावल किशन सिंह (मुख्य आयुक्त सीमा शुल्क व उत्पाद शुल्क, बड़ौदा, भारत सरकार की सेवा) 2011 में सेवानिवृति के बाद में अपने पुश्तैनी गांव जसोल में आये। उन्होने उक्त न्यास का कार्य सुचारु रुप से व्यवस्थित करने हेतु एक औपचारिक ट्रस्ट के गठन का कार्य अपने हाथ में लिया। उक्त न्यास के विकास हेतु उन्होने एक ‘‘मास्टर प्लान‘‘ अरणोदय आर्किटेक्ट (श्री कीर्ति सिंह) से बनवाया ताकि श्रद्धालुओ हेतु सुविधायें उपलब्ध कराई जा सके –

ट्रस्टियों की सूची

  1. रावल किशन सिंह जसोल – अध्यक्ष
  2. रावल विक्रम सिंह सिणधरी – सदस्य
  3. रावत त्रिभुवन सिंह बाड़मेर – सदस्य
  4. ठा. गम्भीर सिंह जसोल – सदस्य 
  5. जस्टिस (से.नि.) रघुवेन्द्र सिंह राठौड़ – सदस्य
  6. ठा. गजेन्द्र सिंह जसोल – सदस्य सचिव
  7. कर्नल ठा. शम्भू सिंह देवड़ा - सदस्य
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